Author Name: – Prof. Kavita Hole, Amrita Aravinda Awale Date:- 26 May 2026
प्रस्तावना
नारी–चित्त का अध्ययन केवल स्त्री–मनोविज्ञान का प्रश्न नहीं, अपितु मानवीय चेतना के आध्यात्मिक विकास की एक अनिवार्य कड़ी है। भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति और प्रज्ञा के समन्वित रूप में देखा गया है — “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”1 (जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवत्व का वास होता है)। यह दृष्टि नारी को केवल सामाजिक भूमिका या भावनात्मक अस्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्म–तत्त्व के साक्षात्कार में सह–साधिका के रूप में प्रस्तुत करती है।
आधुनिक मनोविज्ञान, यद्यपि स्त्री–स्वभाव को भावनात्मक बुद्धि, सहानुभूति और सामाजिक संवेदनशीलता के संदर्भ में देखता है, तथापि वह नारी–चित्त के उस अंतःप्रकाश को नहीं समझ पाता जो भारतीय दर्शन में “आत्म–विद्या” से संबद्ध है। फ़्रायड और युंग जैसे मनोवैज्ञानिकों ने स्त्री के मनो–संरचना पर विमर्श किया है, परंतु उन्होंने आत्म–बोध के आध्यात्मिक आयाम को अपने सिद्धान्तों में स्थान नहीं दिया। यही कारण है कि आधुनिक नारी–मनोविज्ञान अधिकतर सामाजिक और जैविक सीमाओं के भीतर ही व्याख्यायित होता है।
भारतीय ज्ञान–परंपरा के अनुसार, “चित्त” केवल मानसिक क्रिया–प्रवाह नहीं, बल्कि वह अंतःकरण है जो आत्मा और मन के मध्य सेतु का कार्य करता है। योगसूत्र में कहा गया है — “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”2, अर्थात् जब चित्त की वृत्तियाँ स्थिर होती हैं, तभी आत्मा का साक्षात्कार सम्भव होता है। यदि इस सूत्र को नारी–चित्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि स्त्री का मन, जो स्वभावतः करुणा, श्रद्धा और भावनात्मक ग्रहणशीलता से परिपूर्ण है, आत्म–साक्षात्कार की दिशा में एक विशिष्ट संवेदनशीलता रखता है।
समस्या यह है कि आधुनिक मनोविज्ञान ने स्त्री–चित्त के इस आत्मिक आयाम की उपेक्षा की है। स्त्री को ‘अनुभूति–प्रधान’ कहकर उसकी चेतना को सीमित किया गया, जबकि उपनिषदों ने नारी के विचार–शक्ति और ब्रह्म–चेतना को समान रूप से मान्यता दी है। बृहदारण्यक उपनिषद् की गार्गी जब याज्ञवल्क्य से ब्रह्म–विचार पर संवाद करती हैं, तो यह केवल तर्क नहीं, बल्कि आत्मा की अन्वेषणा है।3 यह साक्ष्य सिद्ध करता है कि भारतीय परंपरा में स्त्री–चित्त का अध्ययन मानव–मनोविज्ञान की जड़ों तक जाता है।
अतः भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के आलोक में नारी–चित्त के अध्ययन का पुनर्विचार आवश्यक है, क्योंकि यह दृष्टि मन, आत्मा और समाज — तीनों के संतुलन की खोज करती है। IKS यह प्रतिपादित करती है कि नारी–चित्त का स्वरूप केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सृष्टि–संज्ञा की ऊर्जा है, जो समस्त सृजन, संवेदना और आध्यात्मिकता का मूल स्रोत है। आधुनिक मनोविज्ञान यदि इस वैदिक दृष्टि के साथ संवाद स्थापित करे, तो नारी–मनोविज्ञान केवल चिकित्सकीय अनुशासन नहीं रहेगा, बल्कि मानवीय चेतना की सम्पूर्णता का अध्ययन बन जाएगा।